“जल संकट एवम् राजनीतिक उदासीनता”

देश के अधिकतर हिस्सों में भूजल स्तर जिस तरीके से नीचे जा रहा है, वह देश के नीति निर्माताओं एवम् पर्यावरणविदों के साथ अन्य वर्गों के लिए भी चिंता का विषय बनता जा रहा हैI हाल ही में जिन 5 राज्यों में चुनाव हो रहे रहे है उनमे भी गिरते भूजल की समस्या एक मुख्य समस्या है जिसमे सबसे आगे उत्तर प्रदेश हैI उत्तर प्रदेश में वर्ष 2016 के अंत में राज्यसभा में जवाब देते हुए जल संसाधन मंत्री सुश्री उमा भारती ने यह कहा था की प्रदेश के 75 में से 33 जिले अतिदोहित (over-exploitation) की श्रैणी में आ चुके है ओर बुंदेलखंड की स्थिती तो सबके सामने है अकेले बाँदा जिले में ही 35% हैण्डपंप सूख चुके हैं इसके आलावा पंजाब, उत्तराखंड की स्थिती भी कोई अच्छी नही है, बेशक पंजाब के पास काफी पानी है लेकिन वहां भूजल के साथ-साथ अन्य जल स्रोत बुरी तरह प्रदूषित हो गये हैI

उत्तराखंड बेशक उत्तर भारत की जीवनदायनी गंगा का मायका है, बेशक उत्तराखंड की ओसतन वर्षा दर अच्छी है लेकिन फिर भी वहां लोग पानी के लिए तरसते दीखते है क्योकि जल प्रबंधन की कोई ठोस व्यवस्था नही हैंI इन राज्यों में चुनाव होने के बाद भी किसी भी राजनीतिक पार्टी ने पानी के मुद्दे को नही उठाया हैंI इससे स्पष्ट होता है की सभी पार्टी इस मुद्दे को गंभीरता से नही ले रही है या इसको मुद्दा नही बनने दे रही हैI जबकी यह आमजन से जुड़ा हुआ मुद्दा है देश को आजाद हुए लगभग 7 दशक हो गये है लेकिन हम लोगो के मूल संवैधानिक अधिकारों में से एक जल के अधिकार को भी पूरा नही कर पाए है आज “खाद सुरक्षा” एवं “बिजली सुरक्षा” की तो बात की जा रही है लेकिन “जल सुरक्षा” पर मुश्किल से ही किसी नेता या पार्टी का ध्यान हैI जबकि जल सुरक्षा में आभाव में हम किसी भी तरह की सुरक्षा की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?देश में 60 % से ज्यादा लोगो की प्यास भूजल(ground water) से बुझती हैं।

देश की अर्थव्यवस्था का केंद्र पानी ही होता है चाहे हमे महसूस न होता होंI जल के आभाव में कोई भी देश तरक्की नही कर सकता है, इसके आभाव में देश की अर्थव्यवस्था धराशायी हो सकती हैI लेकिन फिर भी भारत में आजादी के बाद मुश्किल से ही जल प्रबंधन पर कुछ ठोस काम हुआ हैI इस देश में कुछ महीने कुछ हिस्से सुखा की चपेट में रहते है ओर कुछ हिस्से बाढ़ से प्रभावित रहते हैI जिस मणिपुर में वार्षिक वर्षा दर ओसतन 1200 मिमि से अधिक ही रहती है वहां भी लोग कुछ महीने पानी की बूंद बूंद के लिए तरसते हैI क्या मणिपुर में उचित जल प्रबंधन करके लोगो को पानी कि समस्या को दूर नही किया जा सकता है? वैसे हम देश को खुले में शौच मुक्त के लिए आगे बढ़ रहे है लेकिन देश के हर घर में पानी के आभाव में हम कैसे हर घर में शौचालय का सपना देख रहे है? बिना पानी शौचालय कैसे कम कर सकते है
जिस तरह देश के कई शहरो एवं उसके आसपास में भूजल स्तर बहुत ज्यादा तेज़ी से गिर रहा है। नोएडा व ग्रेटर नोएडा देश की राजधानी दिल्ली से सटे इन शहरो में भूजल स्तर गिरावट के मामलों में चौकाने वाले नतीजे सामने आये है।

 

स्थानीय लोगो के अनुसार आज से मात्र कुछ साल पहले तक इस एरिया में भूजल स्तर मुश्किल से 1 मीटर निचे था। लेकिन अब उसी पानी को ढूँढने के लिए गहरे बोरवेल लगवाने पड़ रहे है और कभी कभी तो ये भी काम करना बंद कर देते है। अब सवाल उठता है की इन हालातो का जिम्मेदार कौन है? आंकड़ो के अनुसार यहाँ पर भूजल दोहन के सबसे बड़े कारण बिल्डर्स एवं कंक्रीट के जंगल को माना गया है। शहर में 500 से ज्यादा बड़ी बड़ी कंस्ट्रक्शन साइट्स हैं जहाँ कंस्ट्रक्शन के लिए रोजाना लाखो लीटर पानी की आवश्यकता होती हैं साथ ही बिल्डर्स ने बेसमेंट बनाने के लालच में अथाह भूजल दोहन करते है, जिसके कारण आस पास का भूजल स्तर काफी नीचे चला गया। यहाँ तक की आस पास के गाँवो के जल स्रोत समाप्त होते जा रहे हैं। इस तरह भूजल स्तर गिरने से सेक्टरों में रहने वाले लोगो को इतनी असुविधा नही होगी जितनी ग्रामीणों को होगी क्योकि भूजल स्तर नीचे जायेगा और विकास प्राधिकरण गाँवो में कस्बो में पानी की अच्छी सप्लाई नही दे पाते हैं प्राधिकरण की प्राथमिकता गाँव नही होते हैं। ग्रेटर नोएडा में पिछले एक दशक से सप्लाई हेतु गंगा वाटर लाने की बात चल रही है लेकिन उस पाइप लाइन का निर्माण पूरा नही हो पाया है इस कारण शहर के तमाम घरेलू एवं औधोगिक जरूरते भूजल से ही पूरी की जा रही है जिससे वहां का भूजलस्तर लगातार घट रहा है एवं रिचार्ज कम हो रहा हैI

केंद्रीय भूजल बोर्ड की एक रिपोर्ट में यह सामने आया की नोएडा, ग्रेटर-नोएडा में औसतन 1 मीटर प्रति वर्ष भूजल स्तर नीचे गिर रहा है। बोर्ड के आकड़ो के अनुसार ही नोएडा वर्ष 2004 में सुरक्षित (SAFE) जोन में आता है वर्ष 2009 के आकड़ो के अनुसार सेमी क्रिटिकल में आगया था एवं वर्ष 2013 के आकड़ो में अतिदोहित की श्रेणी में आ चुका है जिसके रोकथाम के लिए सरकारी स्तर पर कोई ठोस कदम नही गये हैI अंत में स्थानीय पर्यावरण एवं सामाजिक कार्यकर्ताओ ने इसके लिए प्रयास शुरू किये लेकिन स्थानीय विकास प्राधिकरण का कोई ख़ास सहयोग नही मिलाI सरकारी तबका केवल नीति बनाने में माहिर है उनके पालन में नही, नीतियों के पालन के अभाव में ही देश के बहुत से हिस्से जल संकट का सामना कर रहे है साथ ही साथ जल संसाधनों पर बढ़ता जनसंख्या दबाव एवम् जलवायु परिवर्तन का प्रभाव हैं।

जल संरक्षण के प्रयास के तहत ही हमने माननीय नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) का रुख अपनाया। हमारी याचिका पर एनजीटी ने 11 जनवरी 2013 को एक बड़ा फैसला सुनाते हुए निर्देश जारी किया की भविष्य में कोई बिल्डर निर्माणकार्य (constrction) में भूजल का दोहन नही करेगा क्योकि एनजीटी ने माना था कि बिल्डर ही भूजल दोहन का बड़ा कारण हैं। विकास प्राधिकरण ने बिल्डर्स को निर्माणकार्य के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) के ट्रीट पानी का ही इस्तेमाल करने के आदेश दिए। इस कड़ी में कुछ बिल्डर्स ईमानदारी से STP का पानी इस्तेमाल कंस्ट्रक्शन में कर रहे है कुछ् बिल्डर्स ने डी-वाटरिंग पर भी रोक लगाई गईं हैं, बेसमेंट के लेवल कम करने का निर्णय लिया हैंI लेकिन कुछ ने इसका भी तोड़ खोज लिया है। दरसअल बिल्डर्स को STP से लिए गए पानी का रिकॉर्ड रखना पड़ता है जिसे वो समय समय पर एनजीटी को दिखाते हैI जिससे स्पष्ट कर सके है बिल्डर भूजल का उपयोग नही कर रहा हैI पानी का टैंकर पर्ची के साथ STP से भर कर तो चलता है लेकिन वो कंस्ट्रक्शन साईट तक नही पहुँचता है बल्कि उस टैंकर को STP के बाहर नाले या खुले मैदान में खाली कर दिया
जाता है और बिल्डर्स के पास सिर्फ पर्ची पहुँचती हैं। जबकि कंस्ट्रक्शन साईट पर आज भी बड़े बड़े बौरवेल की मदद से भूजल इस्तेमाल किया जा रहा है। क्योकि बिल्डर नही चाहता की वह टेंकर का पानी उपयोग करेंI क्योकि टेंकर से उसकी जरुरत पूरी नही हो सकती है बल्कि STP का पानी को बिल्डर कंस्ट्रक्शन के लिए उपयुक्त भी नही मानते है उन्हें उसे ट्रीट करना पड़ेगा इसलिए वह भूजल उपयोग करते हैI

अब समय आ गया है की देश में जल एवं भूजल संरक्षण के लिए ठोस काम हो एवं देश की राजनीति में जल प्रबंधन, संरक्षण एक अहम मुद्दा बने, चुनावी मुद्दा बने क्योकि राजनीतिक इक्षाशक्ति के आभाव में कोई भी मुद्दा
मुश्किल से ही हल हो सकता हैI

विक्रांत तोंगड़ (पर्यावरण कार्यकर्ता)

(लेखक कई वर्षों से जल एवम् पर्यावरण संरक्षण पर कार्य कर रहे हैं)

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